जब ख़ामोशी बोलने लगी
कुछ ख़ामोशियाँ आवाज़ से अधिक कहती हैं। वे हमारे भीतर जमा उन शब्दों को सँभालती हैं जिन्हें कहने का सही समय शायद कभी आया ही नहीं।
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कुछ ख़ामोशियाँ आवाज़ से अधिक कहती हैं। वे हमारे भीतर जमा उन शब्दों को सँभालती हैं जिन्हें कहने का सही समय शायद कभी आया ही नहीं।
आगे पढ़ें ↗क्या हर कहानी को अंत चाहिए? शायद नहीं। कुछ अधूरेपन हमें लंबे समय तक अपने बारे में सोचने के लिए छोड़ जाते हैं।
आगे पढ़ें ↗पुरानी लिखावट में अपना ही एक पुराना चेहरा दिखाई देता है। कुछ चिट्ठियाँ समय को वापस नहीं लातीं, लेकिन स्मृति को ज़रूर जगा देती हैं।
आगे पढ़ें ↗एक सवाल और उसके उत्तर के बीच जो थोड़ी-सी ख़ामोशी होती है, शायद वहीं सबसे सच्ची कहानी रहती है।
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